मंगलवार, 24 सितंबर 2013

अश्रुदान....

ट्रैफिक सिगनल पे,
इंतजा़र के उन क्षणों में -
एक हाड़ मांस की पुतली....
सत्तर की उमर और चीथड़ों में,
खुद के स्वाभिमान की चाशनी लिये-
आ खड़ी हुयी मेरे करीब ,
काँपते हाथ बमुश्किल से फैलाये हुये ।
उसकी आँख सूखी रेत की सहरा सी विस्तार लिये -
पेट और पीठ के बीच,
सूत भर की भी जगह नहीं -
और  फैली हाथ की रेखा,
वर्षों की मिहनत की गवाहगार बनी हुयी ।
मैं उद्विग्न हो उठा ,और -
इससे पहले की अपने पर्स से,
चंद रूपये निकाल -
उसके फैले हथेली में रखता.....
मेरी आँखों के कोर ,
टपका पड़े अश्रु की एक बूँद हो ।
उसने मुटठी बंद कर,
स्वीकार किया मेरे उस दान को ।
फिर एक हाथ बढ़ा मेरे माथे को छुआ -
और कहा-
इससे कीमती दान मुझे आजतक नहीं मिला,
मैं इसके पीछे छिपी भावना समझती हूँ, और खुश हूँ -
कि मुझे किसी ने आज समझा तो ,
वरना -
बच्चों को अपना पेट काट खिलाने की आदत ,
मुझे सदियों से रही है -
हाँ, उनकी आँखों में अब मुझे अपने लिये -
आँसू नहीं दिखते....
मेरी लोरी सुने बिना ,
जो सोते नहीं थे कभी -
आज उन्हें मेरी ममता भरी आवाज,
शोर सी लगती है।
मैं भीख नहीं मांगती हूँ ,
फैला के ये हाथें -
मुझे तो इस भीड़ में कोई अपना सा चाहिये,
जो इस आँसू की एक बूँद ने -
मुझे मुझसे मिला दिया ।
- नीहार( चंडीगढ़,सितंबर २३ ,२०१३ की सुबह और माँ की याद )