शनिवार, 14 सितंबर 2013

मेरे भीतर एक मोगली रहता है ......

मेरे भीतर ,
दरका है कुछ -
शायद मेरा विश्वास,
मनुष्य के होने पर ।
सोचता हूँ कि,
सभ्य होना अगर - 
यही है कि ,
रक्षक ही हत्यारे हो जाएँ -
संत असंगत कार्यों में लिप्त ।
प्रजा का तंत्र -
प्रजा के लिये ही षडयंत्र हो,
और-
हर गरीब के मुँह की रोटी से ,
ज्यादा कीमती और पौष्टिक -
किसी अमीर के कुत्ते का बिस्कुट हो  ,
तो - 
मुझे नहीं रहना ऐसे सभ्य समाज का ,
हिस्सा हो ।
मुझे वापस किसी जंगल में छोड़ आओ,
जहाँ मुझे बड़े ही लाड़ दुलार से - 
पाला था शेर चीते हिरण और गजराज ने,
मुझे मोर,बंदर और न जाने कितने जानवरों ने -
अनुशासन और कायदे कानून सिखाये ।
मुझे हर प्रजाति के जानवरों का सम्मान करना सिखाया गया.....
मुझे यह बताया गया कि सभ्यता का अर्थ,
कमजोर से कमजोर का सम्मान करना है -
और ताकत का प्रयोग,
सिर्फ रक्षा के लिये किया जाता ।
मुझे नहीं रहना -
किसी ऐसे समाज का हिस्सा बन,
जहाँ मनुजता सिर्फ किताबों के पन्नों में पाई जाती - और,
हैवानियत बिना मोल के हर जगह लुटाई जाती ।
इससे बेहतर मेरा जंगल है- 
जहाँ न तो फसाद है - न दंगल है,
जो भी है ,
बस कुशल मंगल है ।
- नीहार ( चंडीगढ़, १४ सितंबर की सुबह - मेरे भीतर एक मोगली रहता है)