रविवार, 22 सितंबर 2013

आईना मुझसे मेरी पहली सी सूरत मांगे..


याद आ गया हमें भी, 
 वो गुजरा हुआ ज़माना -
 एक संग जमीं पे बैठ कर, 
लिट्टी व चोखा खाना - 
फिर बैंक और देश की,
 पालिटिक्स पे बातें करना-
 मन का सारा विकार यूँ,
 हँसते हुये निकालना ... 
वो बच्चों की खिलखिलाहट, 
वो गृहणियों की चहचहाहट- 
हम उसमें सुन लिया करते, 
सपनों की गुनगुनाहट .... 
चलो पीछे ले चलें हम,
 समय को जरा घुमाकर - 
शायद ये हम जान पाएँ, 
कि हम कितना बदल गये हैं... 
ओढ़ रक्खें हैं हमने चेहरे, 
अपने चेहरे पे न जाने कितने -
 कि आईना भी हमसे अक्सर, 
हमारा पता पूछता है ।
 पलट लो जरा ये अल्बम, 
जो हमें हमारे होने का - 
है सबूत पेश करता । 
चलो उतार दें हम ये चेहरा, 
जिसने मशींदोज़ हमें किया है - 
हमें सुविधा भोगी करके,
 हमसे छीनी है हमारी पहचान....
 चलो फिर से उस जहाँ में, 
जहाँ रोटी नमक भी हमको -
 देती थी अगाध खुशियाँ.... 
जहाँ बच्चों की धमाचौकड़ी, 
में सुनते थे झरनों की झर झर- 
जहाँ पत्नियों के उलाहने में, 
रहता था प्यार का ही तेवर ....
 वही थी हमारी दनिया, 
जहाँ दीवार न थी कोई- 
हम आदमी से मिलते थे, 
बस आदमी ही होकर । 
ये तस्वीर मुझसे कहती, 
चल आ के मुझसे तू मिल ... 
मैं तुझे मिला दूँ तुझसे,
 जिसे तू कब से ढूँढ़ता था । 
- नीहार ( एक चित्र को देखकर अचानक उमड़े भावनाओं का ज्वार काव्य रूप में- आभार विकास रंजन । एवं सुशील प्रसाद )