गुरुवार, 3 अक्तूबर 2013

गांधी मरा नहीं करते.....


मैं सिर्फ और सिर्फ एक ही गाँधी को जानता हूँ......
मैं सिर्फ और सिर्फ एक ही गाँधी को मानता हूँ......
बाकी जो भी है -
सब बकवास है .......
बालुका के ढ़ेर पे,
उगी कँटीली घास है -...
झूठ और हिंसा का,
किये वस्त्र विन्यास है.....
बेईमानी और अनाचार का,
फलता फूलता न्यास है ।
गाँधी -
कोई नाम या पदवी नहीं....
गाँधी -
कोई खादी या टोपी नहीं......
गाँधी -
कोई लाठी नहीं चरखा नहीं.....
गाँधी -
जंतर मंतर पर बैठा,
कोई उपवासी नहीं......
और न ही किसी आश्रम में -
अपनी दूकान चलाता संत है गाँधी ।
गाँधी -
एक विचार है,
जो कभी मरा नहीं .......
गाँधी -
मरा नहीं करते ।
- नीहार ( चंडीगढ़, २ अक्टूबर २०१३ )
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