शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011

बादलों सा मन....

सूरज की हथेली पर -

चाँद का चेहरा लगा है.....

उनकी पलकों को चूम कर-

जो हम आ गए ,

अधर मेरा उनकी मादकता से पगा है....

फूल सब मुरझा गए -

ये सोच कर,

की धरती पर तो -

सितारों का मेला लगा है.....

मुझपे तुम्हारी जुल्फ ने -

की है घनेरी छांह......

धूप बिचारा ये देख कर ठगा का ठगा है।

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जब भी मुझे -

खुशबु में नहाने का मन करता है,

पलकें बंद कर तुम्हारे पास पहुँच जाता हूँ,

और फिर -

तुम्हारे जुल्फ के साए की खुशबु में नहाता हूँ।

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तेरी पलकों पे ख्वाब तिरने लगे हैं,

हम भी तेरी याद में अब घिरने लगे हैं.....

मन बादलों सा हो गया है मेरा जबसे,

बिना पंख के हम यूँ ही फिरने लगे हैं....

तितलियों की भाषा में हम गुनगुना कर,

भँवरे सा नशे में हम झूम कर उड़ने लगे हैं....

शांत नीरव मन के जंगल में हम सखी,

झरनो के कल कल निनाद सा छिड़ने लगे हैं।

आकाश में उड़ने की आदत नहीं है हमको,

उड़ने की कोशिश करते हुये हम गिरने लगे हैं।