सोमवार, 18 अप्रैल 2011

कतरा कतरा मोम सा पिघलता रहा ............

रात यूं ही देर तक चाँद फिर जलता रहा,

आसमां कतरा कतरा मोम हो पिघलता रहा।

वो अजीब शख्स है किसी की भी नहीं सुनता ,

उसकी खातिर ही सही मगर वो बदलता रहा।

उठ के गिरता रहा और गिर के उठता रहा,

रात और दिन मगर खुद ही वो संभलता रहा।

वो उफक पे बिखरे हुये है अपने सौ सौ रंग,

वो सूरज है अपने मुंह से धूप को उगलता रहा।

वो जानता है की चलने का नाम ही है ज़िंदगी ,

इस जिंदगी की खातिर रात दिन वो चलता रहा।

छले जाने का डर उसको सालता है हर समय ,

डर से निजात पाने को खुद को ही वो छलता रहा।

वो जानता है पानी के बिन तड़प उट्ठेगा आदमी,

उनकी प्यास बुझाने को वो बर्फ सा गलता रहा।

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पाजेब बज रही है या खनकता है तेरा कंगन

आँखें हैं की तेरी याद में बरसती हैं ज्यूँ सावन।

तुझको पाने की ख़्वाहिश कुछ इस तरह सुलगी,

की मन मेरा राम के बदले हो जाना चाहे रावण ।

तेरे बिना सब उदास सा लगे फीका लगे हर रंग ,

जो तू हो साथ तो फिर सहरा भी लगे मनभावन।

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वो अपनी आँख में खंजर छुपाए बैठा है ,

मेरी ही तबाही का मंज़र छुपाए बैठा है।

वो जानता है कि मुझे तैरना नहीं आता,

इसलिए खुद में वो समंदर छुपाए बैठा है।

जिसको भी देखता है सम्मोहित किए देता,

अपने अंदर वो जादू मंतर छुपाए बैठा है।

जिधर से भी गुज़रता है तूफान उठा देता है,

अपने सीने मे वो एक अंधड़ छुपाए बैठा है।

उसकी आँख में सबके लिए मोहब्बत है ,

अपने भीतर वो एक मंदर छुपाए बैठा है।