सोमवार, 4 अप्रैल 2011

एक आहट एक सुगबुगाहट ....

वक़्त बेवक्त –

एक आहट दिल को बहला कर गयी,

एक हवा –

शीतल मलय बन मेरे घाव को सहला गयी ।

एक उदासी –

लंबी होकर लिपट गयी मेरे जीस्त से,

एक खामोशी –

दर्द का नगमा हौले हौले सुना गयी।

एक मुसाफिर –

चलते चलते थक गया सालों साल से,

एक याद तेरी –

बन के चाँदनी उसकी रूह को नहला गयी।

खाली सा ये दिन –

लिए आया है थाल भर कोहसार,

फूल सारे –

खिलना भूल जैसे की शर्मायी हुयी।

मेरी आँखें –

हर वक़्त तुमको हैं ढूंढती,

तुम प्रिये –

हर शय में जैसे हो छायी हुयी।

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जलती आग ,

उठता धुआँ...

सूखे होंठ,

प्यासा कुआँ...

मन है बादल,

नैन छलछल...

दिल मुरझाया और,

गुमसुम कमल...

हाथ में राख़ –

समय भस्मित ,

काल के मकड़जाल में –

मैं हुआ विस्मित।