रविवार, 10 अप्रैल 2011

अपेक्षाएं

अपने आप से अपेक्षाएं रखना बुरी बात नहीं -

पर,

शायद उनका पूरा न होना,

कहीं तोड़ता है भीतर ही भीतर....

आदमी का मेरुदंड -

धीरे धीरे गलता जाता है...

उसका विश्वास ख़त्म होता जाता है,

और वह-

तब्दील होता जाता है गुंथे आटे की तरह ,

जिसे -

जो , जब, जैसा चाहता है वैसा ही रूप देकर,

पका डालता है वक़्त के गर्म तवे पर।

इसलिए -

अपेक्षाएं रक्खे बिना ही जीना.....

ज्यादा अच्छा है।

न तो मेरुदंड गलता है....

न ही विश्वास ख़त्म होता है...

और -

न ही वह गुंथे हुए आटे में तब्दील होता है।

पर आखिर है तो वह आदमी ही ना....

प्रयास तो करेगा ही -

धीरे धीरे ,

मकड़ी की तरह -

ऊपर चढ़ेगा...

जाल बुनेगा....

और फिर काल रुपी गिरगिट के-

लोलुप जिह्वा का ग्रास बन,

वक़्त से पहले ही भोज्य होगा...

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क़ुतुब सी -

ऊंची छलांग मार कर हम,

चाहते हैं ऊपर उठना।

पर -

हम यह भूल गए कि,

गिरेंगे तो बच पायेंगे क्या?

क्या दधिची बन कर,

हम अपनी हड्डी के चूरे से,

एक नयी श्रृष्टि का निर्माण करेंगे?

या हम स्फिंक्स कि माफिक ,

फिर दुबारा जीवित हो खड़े हो जायेंगे...

शायद -

पुनर्निर्माण कि प्रक्रिया -

हमारे ऊपर उठने और गिरने से ही जुडी है।

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मैं -

शब्द रहित -

व्याकुल मन से -

पूछूं तुमसे कि तुम -

कहाँ कहाँ रहती हो सजनी।

तुम -

चबा चबा -

कर शब्दों को -

कहती हो धीरे से मुझसे-

दिनन न चैन चैन नहीं रजनी।

सब -

व्याकुल सब -

परेशान हो कहते -

अब चल दूर कहीं -

जहाँ कहीं भी चैन मिले -

और मिले शांति कि गंगधार-

जिसमे डूब डूब कर तुम हम सब -

भूल जाएँ सब दुःख -

पाएं नित दिन हम सुख -