शनिवार, 22 जनवरी 2011

किसलय क्यूँ है उदास

किसलय क्यूँ है उदास -

बुझ नहीं रही अनबुझी प्यास....

सागर सागर भटका बादल,

प्यासा है फिर भी आकाश।

पत्तों से टपका एक बूँद -

रात ने ली जब आँखें मूँद....

उम्र फिर बन कर दरिया अनेक,

बहता अबाध पत्थर तराश।

सूरज की आँख ने रोया धूप -

मन का हर गया तिमिर कूप...

जीवन का हर गया सब विषाद,

अग्नि पीकर खिला ज्यूँ पलाश।

चन्दन से लेता है गंध उधार -

फिर लाता बेमौसम बहार...

प्रकृति का निखारता रंग रूप,

सुंगंधित करता फिर अपनी श्वास।

-नीहार

अक्स


यह मेरा अक्स है या उसका या हम दोनों का....यह रेखाचित्र मुझे उसतक पहुंचाता है....
-नीहार

वियोग

यह रेखाचित्र मैंने एक सप्ताह पूर्व बनाया और इसका नं 'वियोग' रक्खा है।

गुरुवार, 13 जनवरी 2011

तुम हो तुम्हारा ख्याल है और चाँद रात है....

कडाके की ठण्ड...कांपती सी हवा जो जम कर टंग सी गयी पेड़ों की फुनगियों पे....जंगल पहाड़ सब ऊंघ रहे हैं...चारों तरफ बिलकुल नीरवता व्याप्त है....दूर कहीं सड़क पे भागती हुयी गाड़ियों की आवाज़ सहसा जीवंत कर देती है पूरे माहौल को ....मन प्राण उड़कर तुम तक पहुचने को आतुर हो उठता है।
मेरी सांसें हैं की गर्म होकर ऊर्ध्वमुखी हो गयी और सुफेद बकुलों सी व्योम की गहराईयों में अपने पंख पसारे परवाज़ कर रही....ढूंढ रही है मेरी आँखें ...कुहासों के एक एक लिहाफ को उठा कर...सिर्फ तुमको...फूलों में,त्रिन्मूलों में,पादप श्रेणियों में,हर जगह बिखरी हुयी ओअस बूंदों में ढूंढता हूँ बस तुम्हारा ही चेहरा......
तुम हो, तुम्हारा ख्याल है और पिघलती रात है....कुहासे की चादर,ओअस की बूँदें और तुम्हारे प्यार में पगा ये प्रभात है।
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तुम हो,तुम्हारा ख्याल है और चाँद रात है....
सर पे नीला आसमान है और तारों से बुनी चादर ओढ़े चांदनी सी झिलमिल रात....हवाओं में तुम्हारी खिलखिलाहट की अनुगूंज मुझे मदहोश कर जाती है। मेरी आँखों के आगे तुम्हारे रूप का विस्तार किरणमयी हो जाता....मैं करवीर के गुंचों सा खिल जाता। मेरी सांसें सुरभित हो जाती तुम्हारी साँसों से...तुम चाँद हो जाती और मैं उस चाँद की आँख से ढलकी अश्रु की एक बूँद .... मोती सा जो तुम्हारी आँख की सीप में बंद हो जाना चाहता है...जीवन भर के लिए...तुम हो, तुम्हारा ख्याल है और चाँद रात है....महकी हुयी हवा...गुनगुनाती चांदनी और सजीली तारों की बारात है....
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तुम हो, तुम्हारा ख्याल है और महकी हुयी सुबह है...कुहसार की चादर ओढ़े नगर, शहर, गाँव...ढूंढ रहा है चंचल चपल सूर्य की नाचती रंगों की आभामयी गरम नरम छाँव...खेतों में सरसों के पीले फूल हवा के साथ अठखेलियाँ कर रहे...सब तरफ शान्ति है...धीरे धीरे सुबह का सूरज सरसों के पीले फूल सा फ़ैल गया चहुँ ओर ....ये तुम्हारा ख्याल है या अमलताश के बिखरे हुए फूल....ये तुम हो या सुबह की महकी हुयी हवा....ये तुम्हारा आलिंगन है या खुद को खुद में समेट लेने की चाह ....ये मेरे कानो में तुम्हारी आवाज़ की खनक है या किसी मंदिर में बजती घंटियों की झंकार....ये तुम मुझे बुला रही हो, या हवा तुम्हारी पाती मुझे पढ़ कर सुना रही है...
तुम हो, तुम्हारा ख्याल है और मदहोश करती सर्द हवा...ये तुम्हारे गेसुओं की खुशबु है जो बन गयी है मेरे हर दर्द की दवा ।
- नीहार
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शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010

जो तुम आ जाते एक बार ....

(महादेवी वर्मा से क्षमा याचना समेत....पहली पंक्ति उनकी है...तो सारा क्रेडिट भी उन्ही का)
जो तुम आ जाते एक बार.....
मन हो जाता सागर अथाह,
हो जाती आसान मेरी ये राह,
झंकृत हो जाता मन का सितार ।
जो तुम आ जाते एक बार.....
चांदनी सित होती हरेक रात,
दिल लाता खुशबू की परात,
जीवन में हर पल होती बहार।
जो तुम आ जाते एक बार.....
खिलता हर तरफ शत दल कमल,
हिम खंड भी फिर जाता है पिघल ,
प्रकृति करती फिर नया श्रृंगार।
जो तुम आ जाते एक बार....
मन हो जाता फिर यमुना का तीर,
पावन हो जाता मेरा अधम शारीर,
मेरी बाहें हो जाती कदम्ब की डार।
जो तुम आ जाते एक बार....
- नीहार
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बारिश में घूमोगे तो फिर धूप सरीखे खिल जाओगे,
फूलों की बस्ती में तुम खुशबु सा घुल मिल जाओगे।
जब रात कटेगी तन्हा तन्हा और मेरी याद सताएगी,
हर करवट तुम मुझको अपनी आँख से बहता पाओगे।
चाँद रात की तरह भटकती खुशबु की दरिया सी तुम,
मुझसे होकर गुजरोगे तो खुद को तुम नहाया पाओगे।
मैं तेरी जुल्फों में कैद हुआ हूँ जाने कितने जन्मों से,
तुम भी जानम खुद को मेरी आँखों में बंद पाओगे।
- नीहार

गुरुवार, 16 दिसंबर 2010

तुम हो तुम्हारा ख्याल है.....

पत्तियों की सांस उखड़ी है...फूल गौहर लुटाये बैठे हैं ...हम ने माना की चांदनी रात को आज हम अपनी आँखों में सजाये बैठे हैं...वो हमें नींद के गाँव ले जाएगा...हमारे कानों में मिसरी घोलेगा ...जब रात चादर में करवटें लेगा...एक ख्वाब धीरे से अपना वरक खोलेगा...
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रात भर मैं वहीँ था...शाकुंतल नगर के आस पास....मृग छौनो के पीछे भागती शकुंतला और उसे निर्निमेष देखता मैं दुष्यंत....वही पहाड़ों की श्रेणी के बीच बनी पूजा स्थली और नमन करते तुम और मैं...साथ साथ....सब कुछ भर गया मुझे सुखानुभूति से....फिर घंटों हम एक दूसरे की आँख में डूबे रहे....तलाशते रहे अपनी निजता को...मेरे काँधे पे तुम्हारा सर....तुम्हें घेरी हुयी मेरी भुजाएं...जैसे किसी वृक्ष को घेरी अमरबेल की लत्तर...अभी भी मुझको तुम्हारे घने गेसुओं की महक भिगोये हुए है....अभी भी तुम्हारी पलकों पे मेरी याद के फूल जुगनुओं से जल बुझ रहे....अभी भी हमारी सांसें एक दूसरे को जी रही.....तुम हो , तुम्हारा ख्याल है और चाँद रात है...मुझे मिली तुम्हारे प्यार की ये अनुपम खैरात है।
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हे सुगंधे!मैं गंधमादन वन के विशाल तरुवर की विटप छांह में तुम्हारा कब से इंतज़ार कर रहा....हवाएं शूल की तरह आ के मुझे चुभ रही...मन आशंकाओं से ग्रस्त हो रहा....हयबदन और दुष्टबुद्धि राक्षसों ने तुम्हे अपहृत तो नहीं कर लिया? मैं अपने तुरंग पे चढ़ दौर के तुम्हारे पास पहुचना चाहता हूँ....पर हाय री किस्मत....तुम शार्दूल वन के वतानिकुलित कक्ष में कैद और तुम तक पहुचने के सारे मार्ग अवरुद्ध कर दिए गए......तुम हो, तुम्हारा ख्याल है और उदास सी धूप है....तुम्हारी चिंता में व्यग्र मन बना अंध कूप है.
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कतरा कतरा रात गल रही,
बूँदें बूँदें बरसे ओस ,
छिटक छिटक कर बरसे चांदनी,
शीतल मलय करती मदहोश।
याद तुम्हारी आती पल पल,
दिल में होती समुद्र सी हलचल,
तुम हो तो मन मृग सा चंचल,
बिन तुम सब हो जाता खामोश।
नयन तुम्हारे मतवाले से,
कर जाते मुझ पर जादू सा,
बाहें तेरी फूल की डाली,
भर लेती मुझको अपने आगोश।
-नीहार

बुधवार, 15 दिसंबर 2010

है चिरंतन सत्य की मैं....


है चिरंतन सत्य की मैं चाहता हूँ बस तुम्हे ही -
मेरी सांसें -
मुखर होकर बस तुम्हारा नाम लेती....
मैं उफक के एक कोने पे,
खिंची सूरज की किरण से -
इन्द्रधनुष सा उभर कर,
व्योम में ये लिख रहा हूँ -
की - हमारे रंग की सरिता,
तुम्ही से रूप को आकार देती -
और तुम्हारी सांस की पंखुरियों पे,
भंवरों का गुंजन हो रहा है।
देखो तुम्हारी ही पलकों के तले,
ढल रही है रात .....
सुलग रहा है दिल ही दिल में
मेरा हर जज़्बात।
-नीहार
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सड़क अंतहीन....
पादप सब चुपचाप -
खोजता छांह पथिक -
बैठ गया थक हार।
है कोलाहल - मन के अन्दर,
चाँद को तरसे - हरा समंदर ....
उजाड़ बियाबान सा है दिन-
रत भी कटती तारे गिन गिन....
आँखें रोज़ रुलाती मोती,
नदिया बन तन मन को धोती।
बदन गल गया पारा पारा ,
न कोई जीता - न कोई हारा।
मन जाए बसे तेरे ही द्वार,
धड़कन बन गयी वीणा की तार -
तेरे नाम की एक जोत जलाकर ,
घूमे है बावरा इकतारा बजाकर।
छुन छुन बाजे तेरी पाँव की पायल,
नृत्य करे मन हो के घायल -
जब से हुआ है प्रेम प्रसंग...
तन जलता सूरज - मन उड़ता तुरंग...
हर तरफ बिखरा है रंग,
मन में जगी है नयी उमंग -
मिट जाता है हर विषाद,
मन में होता है हर्ष....
तेरा तुझको समर्पित करता मन सहर्ष ।
-नीहार
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वो ओस की नम सी बूंदों में,
कहीं फूलों की पंखुरियों में -
तुम्हारे साथ गुज़ारे पल -
मुझे जज़्ब कर खुशबु कर देते।
मेरी पलकों से लटकी हुयी बर्फ सी,
वो अश्रु की एक बूँद...
तुम्हारी सूखी हुयी सी आँखों में,
पिघल कर नदी हो जाती।
चलो मैं तुम्हे नींद के कुछ पल चुरा कर दूँ...
ख्वाब तो ख्वाब हैं,
चलो उनको धुनें बादलों सा मैं उड़ा दूँ।
-नीहार

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