बुधवार, 15 दिसंबर 2010

है चिरंतन सत्य की मैं....


है चिरंतन सत्य की मैं चाहता हूँ बस तुम्हे ही -
मेरी सांसें -
मुखर होकर बस तुम्हारा नाम लेती....
मैं उफक के एक कोने पे,
खिंची सूरज की किरण से -
इन्द्रधनुष सा उभर कर,
व्योम में ये लिख रहा हूँ -
की - हमारे रंग की सरिता,
तुम्ही से रूप को आकार देती -
और तुम्हारी सांस की पंखुरियों पे,
भंवरों का गुंजन हो रहा है।
देखो तुम्हारी ही पलकों के तले,
ढल रही है रात .....
सुलग रहा है दिल ही दिल में
मेरा हर जज़्बात।
-नीहार
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सड़क अंतहीन....
पादप सब चुपचाप -
खोजता छांह पथिक -
बैठ गया थक हार।
है कोलाहल - मन के अन्दर,
चाँद को तरसे - हरा समंदर ....
उजाड़ बियाबान सा है दिन-
रत भी कटती तारे गिन गिन....
आँखें रोज़ रुलाती मोती,
नदिया बन तन मन को धोती।
बदन गल गया पारा पारा ,
न कोई जीता - न कोई हारा।
मन जाए बसे तेरे ही द्वार,
धड़कन बन गयी वीणा की तार -
तेरे नाम की एक जोत जलाकर ,
घूमे है बावरा इकतारा बजाकर।
छुन छुन बाजे तेरी पाँव की पायल,
नृत्य करे मन हो के घायल -
जब से हुआ है प्रेम प्रसंग...
तन जलता सूरज - मन उड़ता तुरंग...
हर तरफ बिखरा है रंग,
मन में जगी है नयी उमंग -
मिट जाता है हर विषाद,
मन में होता है हर्ष....
तेरा तुझको समर्पित करता मन सहर्ष ।
-नीहार
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वो ओस की नम सी बूंदों में,
कहीं फूलों की पंखुरियों में -
तुम्हारे साथ गुज़ारे पल -
मुझे जज़्ब कर खुशबु कर देते।
मेरी पलकों से लटकी हुयी बर्फ सी,
वो अश्रु की एक बूँद...
तुम्हारी सूखी हुयी सी आँखों में,
पिघल कर नदी हो जाती।
चलो मैं तुम्हे नींद के कुछ पल चुरा कर दूँ...
ख्वाब तो ख्वाब हैं,
चलो उनको धुनें बादलों सा मैं उड़ा दूँ।
-नीहार

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