सोमवार, 12 अगस्त 2013

लचक जात हरसिंगार......

उचक उचक चलत नार,
लचक जात  हरसिंगार ।
मुसक मुसक देखि देखि,
दिल पर फिर करत वार ।
छम छम छम बरसे मेघ,
नाचत मयूर पंख पसार ।
कोकिल सी बोली सुन,
झंकृत मन का सितार ।
बैठी रही नदी के तीर,
करत पी का इंतजार ।
घँूघट से झाँकि झाँकि,
दूर करत हैं अंधियार ।
चंद्र समान मुखड़ा को,
तिल देत और निखार ।
नागिन सौं बल खात,
केश राशि कंठ हार ।
दिखला के एक झलक,
देती मेरा मन पखार ।
उसके एक दरस से ,
जीवन में आत बहार ।
 - नीहार