बुधवार, 14 अगस्त 2013

इक छाँह की तलाश में


कई साल से मैं तन्हा इस शहर में रहा,
भटकता कभी रात कभी दोपहर में रहा।
मैं परिन्दों सा उडता रहा हवा में यूँ ही,
मछलियों सा तैरता मैं समन्दर में रहा।
लोग सोचते हैं जिन्दगी से मैं हँू हारा हुआ,
मेरा वज़ूद मगर ख़ुमारि ए जफर में रहा ।
उसे इश्तहार बन चिपकने की चाह थी,
वो िजस जगह भी रहा बस ख़बर मे रहा ।
सुर्खरु होते हैं लोग ठोकरें खाने के बाद,
ये सोच वो ताउम्र सबकी ठोकर में रहा ।
हैै हवा का झोंका बहना उसकी फितरत,
खुशबू बिखेरे  वो शाम ओ सहर में रहा ।
उसने सुना था कि उसकी आँख सीप है,
आँसू हो के कैद वो उसकी नजर में रहा ।
कोरे कागज़ पे लिखा था आँसू से पता तेरा,
मैं तुझको ढूँढता हर गाँव हर शहर में रहा ।
इक छाँह की तलाश में उमर भर नीहार,
तपती धूप में भटकता हुआ सफर में रहा ।
- नीहार (चंडीगढ, अगस्त १४,२०१३)