शनिवार, 2 फ़रवरी 2013

सोने सी धूप और आँख का वज़ू करना....

तेरे आरिज़ पे बिखरा जो -
तबस्सुम का गुमा देता है....
मेरी आँख का आँसू है,
जो तूने पीने की कोशिश की है।
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आह तेरा जागना और -
यूं मुझ से लिपट जाना .....
ये ख्वाब तो फिर ख्वाब में,
जीता रहूँ तमाम उम्र ।
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 तेरे रुख से जो ज़ुल्फों को -
हटा दिया मैंने.......
धूप सोना हो के मुझसे,
लिपट गयी है आज।
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तुम सोचते होगे कि -
मैं तुम्हें इतना सोचता क्यूँ हूँ....
जो न सोचा करूँ तुमको,
तो फिर जीने का मक़सद नहीं मेरे पास।
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आँखें बंद किए मैं -
बस तुझे देख रहा हूँ.....
पलकें इस तरह मेरी,
वज़ू करती हैं आजकल।

- नीहार (चंडीगढ़,जनवरी 2013 की कोहसार मे लिपटी सुबह )