गुरुवार, 14 फ़रवरी 2013

मुतमइन हूँ बहुत.......


मुतमईन हूँ बहुत –

सांस लेता नहीं ,

चलता रहता हूँ पर -

मैं हूँ जीता नहीं....

पढ़ लिया सारी दुनिया के,

वेद औ क़ुरान –

जिंदगी की किताब ,

मेरी कोई गीता नहीं......

मेरे भीतर धधकती है,

ज्वाला सी जो –

उसमें चिंगारियाँ हैं,

पर  पलीता नहीं ...

मुट्ठियों में लिए हूँ –

खुद के चिता की मैं राख़,

है  सजने सँवरने का –

मुझको  सलीका नहीं।

-    नीहार