बुधवार, 9 मार्च 2011

ये न थी हमारी किस्मत .....

(मिर्ज़ा ग़ालिब से क्षमा याचना समेत )
ये न थी हमारी किस्मत की विसाल ए यार होता,
हर जनम तू मेरी होती और मैं तेरा नीहार होता।
रात भर मैं सोता तेरी जुल्फों की चादर ओढ़ कर,
मेरी आँख जब भी खुलती,बस तेरा ही दीदार होता।
तेरी बांहों में सिमट कर मैं पिघल पिघल सा जाता,
तेरी साँसों में रच बस कर मैं खुशबु ए बहार होता।
तेरी पलकों के साए तले ही मेरा ख्वाब रंग पाता ,
तेरी कातिल निगाह का बस मैं ही एक शिकार होता।
तुझे ढूंढता रहा मैं हर शहर हर गाँव हर गली में ,
मुझपे छाया हुआ हरदम बस तेरा ही खुमार होता।
मेरे काँधे से लगी हुयी तुम जब थक हर के सो जाती,
तुझको घेरती हुयी मेरी ये बाहें शज़र ए देवदार होता।
तेरी आँखों से जो पीता हूँ तो जी जाता हूँ हर पल को,
तू मेरी ज़िन्दगी होती जानम और मैं तेरा प्यार होता।
-नीहार
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तुम्हारी बाहें हैं हज़ार राहें
हरेक राह मुझे तुम तक है ले जाती।
जहाँ नहीं तुम सब रास्ते हैं गुम
लौट लौट जाती वहां से मेरी निगाहें।
तुम सिर्फ हमको चाहो हम सिर्फ चाहें तुमको,
मोहब्बत को मिल जाये फिर खुशबु की पनाहें।
न कोई शिकवा न गिला कोई हमको,
न आंसू बहे और न ही निकले कोई आहें।
तमन्ना है बस इतना की तुम सामने रहो बैठी,
तुम मुझको सराहा करो और हम तुमको सराहें।
-नीहार
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(यह छंद पूर्व में भी सम्पादित किया गया है पर इसमें शुरू की दस पंक्तियों के बाद नवल पंक्तियाँ हैं.पाठक चाहें तो दिनांक २८ फरवरी की रचना का पुनः पठन कर आस्वादन कर सकते...कुछ फर्क तो मिलेगा स्वाद में.)
सांस -
महकी हुयी -
खोजती है तुम्हे,
मन के अन्दर-
समर्पण की जगे भावना ।
तुम -
जो होते हो पास -
तो -
मन की वीणा पे फिर,
करता रहता हूँ मैं -
नित्य दिन साधना।
दूर -
करती हो तुम
मेरे मन का तिमिर,
हर-
लेती हो तुम
मेरी हरेक यातना।
मांगता हूँ तुम्हे
रात दिन -
मैं दुआ में,
मंदिर में-
ईश्वर से करता,
मैं तेरी याचना।
-नीहार
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सुबह -
निचोड़ी हुयी रात का दर्द,
मेरी आँखों से -
यूँ बहा.....
जैसे कि ,
बारिश में -
उफनती हुयी दरिया...
जैसे कि,
खिलते फूल से -
पिघलती खुशबु....
जैसे कि,
मन के अन्दर -
घुमड़ता कोलाहल....
जैसे कि -
किताब के पन्नो में -
बिखरी चाँद हर्फें....
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