शनिवार, 5 मार्च 2011

कुछ खुशबु जैसी बातें....

तुम हो, तुम्हारा ख्याल है और मदमाती सी सुबह है.....
सामने ठाठें मारता विशाल समुद्र,
जिसकी लहरों पे डोलती छोटी छोटी नौकाएं -
जैसे नीले आसमान में टिमटिमाते सितारे...
झिलमिल झिलमिल से।
लहरें चांदी की परात सी रौशनी का फानूस बनी हुयी...
दूर उफक पे खुर्शीद का जादू खून सा रंग लाता हुआ -
या जैसे कोई नवब्याहता के कनक से दमकते चेहरे पे,
जैसे गुलाल का विस्तार...
या जैसे किसी ने सागर की मांग में सिन्दूर की लाली सजा दी हो।
बगुलों की जमात उड़ उड़ कर-
सूरज को लीलने की कोशिश करती हुयी....
हवा मद्धम सी गुनगुना कर ,
तुम्हारी खुशबू लाती है ...
और मैं जी उठता हूँ।
मेरी सांसें पुखराज हो समुद्र की लहरों पे,
सूर्य किरणों की पाजेब बाँध रक्स करने लगती हैं...
यादें मोती बन पेरी पलकों पर ,
जुगनुओं सा मचलने लगती हैं।
मैं तुममे उसी तरह खो जाता हूँ,
जैसे हवा में फैली हुयी धूप।
तुम हो, तुम्हारा ख्याल है और आँखों में बंद तुम...
धड़कन है, सांसें हैं और उनमे बसी तुम।
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तुम हो, तुम्हारा ख्याल है और कोहसार में लिपटी सर्द रात है....
घने पेड़ अपनी परछाइयों को ओढ़ कुनमुना रहे,
उनके पत्ते ठण्ड में बर्फ हो काले होते जा रहे
तुम्हारी खुशबु मुझे कई कई रंगों में ढूंढती है,
शाख सोये सोये से हैं...
पूरा शहर सुनसान और चौराहों पर अलाव के धुओं की तपिश,
मुझे खींच लेती है अपनी ओर...
मेरी आँखें उन धुओं को पी लेती ,
और मचलती हुयी दरिया हो जाती।
सारा का सारा मंज़र राख हो जाता...
तबियत भी उदास हो जाती।
ऐसे में तुम्हारी याद -
दवा बन कर मेरे पास होती।
रात भर सोया रहा ओढ़े हुए यादों का लिहाफ....
नम थी आंखें पर फिर भी दिख रहा था हमें साफ,
तुम थी मेरी आँखों के आगे ओढ़े हुए बर्फ ,
मैं था अपने लब पे तुझे नम किये हुए...
हर आहट में तेरे क़दमों के फूल मैं चुन रहा -
मैं अपने दिल में तेरी धडकनों को सुन रहा।
तुम हो, तुम्हारा ख्याल है और अलसाई सी सुबह है...
मेरी पलकों पे रात शबनम सी बिखरी हुयी है।
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तुम हो , तुम्हारा ख्याल है और बर्फ सी रात है....
क्गंद्नी खुद को कुहसार में तब्दील कर चुकी,
चारों तरफ सिर्फ कुहासे ही कुहासे -
पेड़ों की पत्तियां सिहर सिहर खुद में सिमटी जा रही,
फूलों का मुंह सूजा हुआ....
उन्हें धूप ने नहीं...कुहासों ने छुआ है।
इस ठिठुरती रात मेंतुम्हारे साँसों की गर्मी -
मुझे एक अलाव से उठती गरम हवा सी नहला जाती है...
मैं पूरी तरह खिल जाता हूँ -
ठीक उसी तरह जैसे जाड़े की सर्द सुबह...
किसी गुलाब को धूप ने छू लिया हो।
मेरा खिलना - गुलाब का खिलना....
तुम हो, तुम्हारा ख्याल है और सुबह की आँख में धूप की तपिश का इंतज़ार है ....
और खिले गुलाब की पंखुड़ियों पे बिखरा हुआ ये नीहार है।