मेरे बारे में

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मैं अभी भी अपने व्यक्तित्व की तलाश में भटक रहा हूँ...बचपन से एक निर्बाध झरने सा जंगल पहाड़ों को चीड़ते हुये बहते रहना मुझे हरदम अच्छा लगता था...तितलियों को उड़ते हुये देखता तो मन ललच जाता था उनके पंख चुराने को...कान्हा का मोरपंख मेरे मानस मे सबसे ज्यादा उपयुक्त वस्तु था खुद के शृंगार का...और बंसी की धुन पर राधा का नृत्य मन को उल्लासित करने का सबसे आसान उपाय...आज भी मेरे लिए ये सारे मौजूद हैं...ये हैं मेरी कल्पना में तो मैं हूँ...

बृहस्पतिवार, 30 जून 2011

ताज़ी क्षणिकाएं

कुछ नयी क्षणिकाएं
खुदा भी आजकल मुझपर ,
कुछ मेहरबान ज्यादा है –
उसको पता है आजकल मैं,
सिर्फ तेरी ही इबादत करता हूँ।
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सितारे सुलग रहे ,
रात के माथे पे यूं -
तेरे माथे पे जैसे,
पसीने चुहचुहा रहे।
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तेरे माथे से जो पसीने को –
अपने हाथों से पोछा मैंने,
हजारों जुगनू मेरी हथेली पे,
रक्स करने लगे ।
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मेरे पाँव खुद ब खुद-
तेरे दरवाजे तक मुझे ले आते,
आज कल मुझे मंदिर जाने की –
आदत सी हो चली है।
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मैं आजकल अपने चेहरे पे –
कई चेहरे लगा लेता हूँ,
जो जैसा देखना चाहे मुझे –
उसे वैसा ही चेहरा दिखा देता हूँ।
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हंस मोती चुगता है ,
जैसे ही उसने ये सुना –
मेरी हथेली पे अपनी आँख के,
मोती टपका दिये।
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वो रात को चुपके से ,
अंधेरा ओढ़ लेता है –
दिन के उजाले उसे,
सूरज बना देते हैं।
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रेत पे लिखता है नाम ,
अपनी उँगलियों से वो –
वक़्त पानी का रेला है,
हर नाम मिटा देता है।
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हर सुबह घर से वो ,
निकलता है ये सोचकर –
शायद कभी अपने घर का,
रास्ता वो भूल जाये।
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हर चेहरे मे ढूँढता है,
खुद का चेहरा हर समय –
जब भी घर से निकलता है,
तो आईना पहन लेता है वो।
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बादल को अगर तुम –
ज़ोर से रुलाना चाहो,
सूरज की आग को,
फिर से हवा दो।
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अपनी मुट्ठी मे –
गुच्छे भर अमलताश लिए,
सोचती रही रात भर की,
धूप उसकी मुट्ठी मे कैद है।
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थरथराते होंठों से –
वो नाम ले रहा है मेरा,
उसको भी वक़्त ने
बोलना है सिखा दिया।
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उसके चेहरे पर जो –
पल भर को झुका मैं तो,
लोगों ने कहा देखो –
आंशिक चंद्रग्रहण है लग गया।
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15 टिप्पणियाँ:

  1. मेरे पाँव खुद ब खुद-
    तेरे दरवाजे तक मुझे ले आते,
    आज कल मुझे मंदिर जाने की –
    आदत सी हो चली है।
    *********************waah

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  2. तेरे माथे से जो पसीने को –
    अपने हाथों से पोछा मैंने,
    हजारों जुगनू मेरी हथेली पे,
    रक्स करने लगे ।...

    मेरे पाँव खुद ब खुद-
    तेरे दरवाजे तक मुझे ले आते,
    आज कल मुझे मंदिर जाने की –
    आदत सी हो चली है।

    सारी क्षणिकाएँ ही लाजवाब हैं ..बहुत सुन्दर

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  3. आपकी किसी पोस्ट की चर्चा है कल ..शनिवार(२-०७-११)को नयी-पुराणी हलचल पर ..!!आयें और ..अपने विचारों से अवगत कराएं ...!!

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  4. बादल को अगर तुम –
    ज़ोर से रुलाना चाहो,
    सूरज की आग को,
    फिर से हवा दो।

    बेहतरीन.

    सादर

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  5. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 05 - 07 - 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    साप्ताहिक काव्य मंच-- 53 ..चर्चा मंच 566

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  6. सारी क्षणिकाएं बहुत सुन्दर...बधाई

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  7. बेहतरीन क्षणिकाएं.
    अपनी मुट्ठी मे –
    गुच्छे भर अमलताश लिए,
    सोचती रही रात भर की,
    धूप उसकी मुट्ठी मे कैद है।
    ***
    तेरे माथे से जो पसीने को –
    अपने हाथों से पोछा मैंने,
    हजारों जुगनू मेरी हथेली पे,
    रक्स करने लगे.
    ये खास पसंद आईं.

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  8. ”.... वक्त पानी का रेला है
    हर नाम मिटा देता है...”

    बहुत सुन्दर लेखन....
    सभी क्षणिकाएं बेहतरीन....

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  9. सभी क्षणिकाएं गज़ब की .....

    स्वतः अभिव्यक्त हो रही है हर क्षणिका...

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  10. मेरे पाँव खुद ब खुद-
    तेरे दरवाजे तक मुझे ले आते,
    आज कल मुझे मंदिर जाने की –
    आदत सी हो चली है।
    ................... बहुत सुंदर...
    आभार ..

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