कुछ नयी क्षणिकाएं
खुदा भी आजकल मुझपर ,
कुछ मेहरबान ज्यादा है –
उसको पता है आजकल मैं,
सिर्फ तेरी ही इबादत करता हूँ।
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सितारे सुलग रहे ,
रात के माथे पे यूं -
तेरे माथे पे जैसे,
पसीने चुहचुहा रहे।
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तेरे माथे से जो पसीने को –
अपने हाथों से पोछा मैंने,
हजारों जुगनू मेरी हथेली पे,
रक्स करने लगे ।
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मेरे पाँव खुद ब खुद-
तेरे दरवाजे तक मुझे ले आते,
आज कल मुझे मंदिर जाने की –
आदत सी हो चली है।
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मैं आजकल अपने चेहरे पे –
कई चेहरे लगा लेता हूँ,
जो जैसा देखना चाहे मुझे –
उसे वैसा ही चेहरा दिखा देता हूँ।
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हंस मोती चुगता है ,
जैसे ही उसने ये सुना –
मेरी हथेली पे अपनी आँख के,
मोती टपका दिये।
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वो रात को चुपके से ,
अंधेरा ओढ़ लेता है –
दिन के उजाले उसे,
सूरज बना देते हैं।
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रेत पे लिखता है नाम ,
अपनी उँगलियों से वो –
वक़्त पानी का रेला है,
हर नाम मिटा देता है।
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हर सुबह घर से वो ,
निकलता है ये सोचकर –
शायद कभी अपने घर का,
रास्ता वो भूल जाये।
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हर चेहरे मे ढूँढता है,
खुद का चेहरा हर समय –
जब भी घर से निकलता है,
तो आईना पहन लेता है वो।
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बादल को अगर तुम –
ज़ोर से रुलाना चाहो,
सूरज की आग को,
फिर से हवा दो।
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अपनी मुट्ठी मे –
गुच्छे भर अमलताश लिए,
सोचती रही रात भर की,
धूप उसकी मुट्ठी मे कैद है।
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थरथराते होंठों से –
वो नाम ले रहा है मेरा,
उसको भी वक़्त ने
बोलना है सिखा दिया।
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उसके चेहरे पर जो –
पल भर को झुका मैं तो,
लोगों ने कहा देखो –
आंशिक चंद्रग्रहण है लग गया।
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bhut khubsurat chadikaaye....
प्रत्युत्तर देंहटाएंbahut achha likha hai aapne...
प्रत्युत्तर देंहटाएंमेरे पाँव खुद ब खुद-
प्रत्युत्तर देंहटाएंतेरे दरवाजे तक मुझे ले आते,
आज कल मुझे मंदिर जाने की –
आदत सी हो चली है।
*********************waah
तेरे माथे से जो पसीने को –
प्रत्युत्तर देंहटाएंअपने हाथों से पोछा मैंने,
हजारों जुगनू मेरी हथेली पे,
रक्स करने लगे ।...
मेरे पाँव खुद ब खुद-
तेरे दरवाजे तक मुझे ले आते,
आज कल मुझे मंदिर जाने की –
आदत सी हो चली है।
सारी क्षणिकाएँ ही लाजवाब हैं ..बहुत सुन्दर
आपकी किसी पोस्ट की चर्चा है कल ..शनिवार(२-०७-११)को नयी-पुराणी हलचल पर ..!!आयें और ..अपने विचारों से अवगत कराएं ...!!
प्रत्युत्तर देंहटाएंक्या बात, बहुत सुंदर
प्रत्युत्तर देंहटाएंsabhi shanikayen ati sundar hain .badhai
प्रत्युत्तर देंहटाएंबादल को अगर तुम –
प्रत्युत्तर देंहटाएंज़ोर से रुलाना चाहो,
सूरज की आग को,
फिर से हवा दो।
बेहतरीन.
सादर
चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 05 - 07 - 2011
प्रत्युत्तर देंहटाएंको ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..
साप्ताहिक काव्य मंच-- 53 ..चर्चा मंच 566
सारी क्षणिकाएं बहुत सुन्दर...बधाई
प्रत्युत्तर देंहटाएंबेहतरीन क्षणिकाएं.
प्रत्युत्तर देंहटाएंअपनी मुट्ठी मे –
गुच्छे भर अमलताश लिए,
सोचती रही रात भर की,
धूप उसकी मुट्ठी मे कैद है।
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तेरे माथे से जो पसीने को –
अपने हाथों से पोछा मैंने,
हजारों जुगनू मेरी हथेली पे,
रक्स करने लगे.
ये खास पसंद आईं.
”.... वक्त पानी का रेला है
प्रत्युत्तर देंहटाएंहर नाम मिटा देता है...”
बहुत सुन्दर लेखन....
सभी क्षणिकाएं बेहतरीन....
सुन्दर क्षणिकायें....
प्रत्युत्तर देंहटाएंसभी क्षणिकाएं गज़ब की .....
प्रत्युत्तर देंहटाएंस्वतः अभिव्यक्त हो रही है हर क्षणिका...
मेरे पाँव खुद ब खुद-
प्रत्युत्तर देंहटाएंतेरे दरवाजे तक मुझे ले आते,
आज कल मुझे मंदिर जाने की –
आदत सी हो चली है।
................... बहुत सुंदर...
आभार ..