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मैं अभी भी अपने व्यक्तित्व की तलाश में भटक रहा हूँ...बचपन से एक निर्बाध झरने सा जंगल पहाड़ों को चीड़ते हुये बहते रहना मुझे हरदम अच्छा लगता था...तितलियों को उड़ते हुये देखता तो मन ललच जाता था उनके पंख चुराने को...कान्हा का मोरपंख मेरे मानस मे सबसे ज्यादा उपयुक्त वस्तु था खुद के शृंगार का...और बंसी की धुन पर राधा का नृत्य मन को उल्लासित करने का सबसे आसान उपाय...आज भी मेरे लिए ये सारे मौजूद हैं...ये हैं मेरी कल्पना में तो मैं हूँ...

सोमवार, 4 जुलाई 2011

प्यार में पगी कविता सी कोई


मेरे सपनो को नया रंग दो,
जीवन भर तुम मेरा संग दो।
पतझड़ में भी रहे जो हरी सी,
मन में मेरी ऐसी उमंग दो।
रहूँ सोचता हर घडी मैं जिसको,
प्यार की वो मीठी तरंग दो।
कागज़ से कोरे इस मन को,
अपने प्यार के रंग से रंग दो।
चन्दन चन्दन महकूँ हरदम,
मेरे जीवन को ऐसी सुगंध दो ।
अमृत बन जो बरसे हरदम ,
मुझे रस पूरित वही मकरंद दो।
मिल ना सका जो अबतक मुझको,
जीवन को ऐसी उमंग दो।
प्यार में पगी कविता सी कोई,
जीवन को तुम नया प्रसंग दो।
-नीहार

4 टिप्पणियाँ:

  1. रहूँ सोचता हर घडी मैं जिसको,
    प्यार की वो मीठी तरंग दो।
    कागज़ से कोरे इस मन को,
    अपने प्यार के रंग से रंग दो।

    एक नेक और सच्चा आहवान कौन मना करेगा ....सुंदर भावनाएं ...आपका आभार

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  2. भाव भीनी कविता,सुन्दरता से अभिव्यक्त है,प्रवेश करती हुई..सुन्दर रचना

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