शुक्रवार, 8 जून 2012

क्षणिकाएँ


क्षणिकाएँ
सुलग उठती हैं यादें,
जंगल में होकर पलाश –
मैं अपनी हथेलियों के बीच,
उनकी आग छुपाता फिरता।
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सोया रहा रात भर मैं,
ख़यालों की छाँव में –
याद तेरी हरसिंगार हो ,
झड़ती रही झड़ती रही।
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खुशबू जो तेरी याद की ,
आई शाम ए हवा के साथ –
तेरा  ख़त समझ के ,
मैंने पढ़ लिया उसे ।
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मुझको सुबह के उजालों ने ,
नीलाम  कर दिया –
वर्ना मैं चाँद बन के,
रातों को चमकता ।
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खुली जो आँख तेरी –
तो धूप पसरी है.....
वरना, तमस की पीड़ा –
बिखरी थी हर तरफ।
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कोई क़रीब आके मुझे -
बेनक़ाब कर गया .....
वरना, मैं ख़ुद को भी –
कभी पहचानता नहीं ।
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आओ कि आके तुम मुझे –
बाहों में भर लो आज .....
मैं हिमशिला पिघल कर ,
दरिया सा उफनना चाहूँ ।
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सुबह की धूप –
थोड़ी सी शरमा गयी.......
आपके चेहरे की रंगत ,
जब से उसने देख ली।
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खिड़कियाँ रात को,
ना खुली रखना....
मेरी याद चुपके तेरे –
सिरहाने आ बैठेगी ।
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