बुधवार, 29 फरवरी 2012

मैं ख्वाब की रेत बिछाता हूँ...

बहुत याद आते हो मुझे -
पलकें बंद करूँ तो,
ख्वाब सा देखूं तुम्हे मैं -
आँख खुलते ही तुम मुझे ,
हर शय में शामिल दिख रही हो....
यह प्यार मेरा प्रसश्त करता ,
आराधना का मार्ग जानम -
चल के जिसपे,
मैं पहुँच जाता हूँ तुम तक....
मेरे थके हारे मन का विश्रामस्थल,
मेरे जन्मों की तपस्या का प्रतिफल है

*******************************
मैं ख्वाब की रेत बिछाता हूँ,
और नंगे पाँव -
तुम तक भागा आता हूँ....
मेरे बदन से चूते हुए श्वेद कण ,
उस रेत पे रात के जुगनुओं की तरह -
दमक उठते हैं....
तुम उन्हें अन्जुरिओं में उठा,
अपनी आँखों में भर लेती हो -
मैंने तुम्हारी आँखों में,
अपने लिए असीम प्यार देखा है.....
मैं उस प्यार के महासागर में -
यूँ ही डूबा रहना चाहता हूँ....
हाँ ,
मैं जीना चाहता हूँ ......

9 टिप्पणियाँ:

  1. bahut sundar likhi hei kavita!!!
    khwab ki ret bicha kar nange paanv uss par bhagna...bahut khub!!

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  2. मैं ख्वाब की रेत बिछाता हूँ,
    और नंगे पाँव -
    तुम तक भागा आता हूँ....
    जीने के लिए काफी है ये ख्वाबों की रेत...

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  3. मैं उस प्यार के महासागर में -
    यूँ ही डूबा रहना चाहता हूँ....
    हाँ ,
    मैं जीना चाहता हूँ ...bahut hi sundar chaah

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  4. छलके प्रेम सुधा.सागर बन...भींगे तन-मन..

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  5. भावों से नाजुक शब्‍द को बहुत ही सहजता से रचना में रच दिया आपने.........

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  6. ये महासागर ऐसा ही होता है जिसमें डूबकर ही जी लिया जाता है .. अच्छी लगी.

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं