मंगलवार, 12 जुलाई 2011

कविताओं कि प्रासंगिकता

 उस वक़्त मेरी कवितायें,मुझसे विद्रोह कर देती हैं,
जब मैं उन्हें प्रसंगों से जोड़ नहीं पाता।
पर मैं उन्हें क्या समझाऊं? - कितना समझाऊं?-
की - जो आजीवन प्रसंगों से खुद कटा कटा सा रहा -
अपने मन के कई भागों में बँटा बँटा सा रहा -
अपने अतीत के साए से सटा सटा सा रहा -
वह, यानी मैं - एक अदना सा कवि ,
अपनी कविताओं को कैसे प्रसंग दूँ ?
कैसे दूँ उन्हें शब्दों की आड़?
कैसे पहनाऊं उन्हें अर्थों का जामा?
कैसे उसे सुर , ताल और लय में बाँधूँ?
मैं लिखता क्यूँ हूँ - यह मुझे मालूम नहीं।
मैं कैसे बताऊँ कि -
जब जब मेरी भाषा मौन हो जाती है,
तब हाथ यक - ब - यक कलम थाम लेते हैं,
और, तब शुरू हो जाती है शब्दों कि हेरा फेरी,
और बेबस कविता -
अपने आप को पन्नो में कैद पाती है।
प्रासंगिकता का प्रश्न बहुत अहम् है,
और - अहम् है कविता का सार्थक होना।
पर मेरी कवितायेँ ( मैं दूसरों कि नहीं जानता) -
यह नहीं जानती - कि,
जीने के लिए -
अर्थ- प्रसंग - इत्यादी, इत्यादी -
खोजना है व्यर्थ - क्यूंकि,
हम जीने के लिए जीते हैं,
उन्हें रफू कर पहनते हैं -
उन्ही को खाते हैं /पीते हैं,
यानी कविताओं में मरते हैं और कविताओं में जीते हैं।
यानी, पूरी कि पूरी कविता ,
जुडी है हमारे जीने से।
कविताओं कि प्रासंगिकता हमारे जीने में है -
कविताओं कि उत्पत्ति हमारे सीने से है -
और अर्थ?अर्थ तो भाव है -
अथाह सागर में लहरों पर डोलता नाव है,
जो कभी न कभी - कहीं न कहीं ,
किनारे लग ही जाएगा, और -
उसी वक़्त , शायद -
मेरी कविता को एक 'अर्थ' मिल जाएगा।
-नीहार