मंगलवार, 15 फ़रवरी 2011

प्रिये तुम्हारा ध्यान कर रहा...

प्रिये तुम्हारा ध्यान कर रहा।
अनजाने अनबुझे शहर में,
रात के इस शांत प्रहर में,
यादों के उठते गिरते लहर में,
तेरी खुशबु में मैं स्नान कर रहा।
प्रिये तुम्हारा ध्यान कर रहा।
क्यूँ लगता है मुझको ऐसा,
दबे पाँव चुपके से आकर,
मेरी दोनों आँखें दबाकर,
तू मेरे जीवन में मुस्कान भर रहा।
प्रिये तुम्हारा ध्यान कर रहा।
तेरी हर चाप धड़कन बन जाती,
तेरी हंसी मुझे संगीत सुनाती ,
तेरी आँखों के नीले समंदर में ,
मैं तिरोहित अपनी थकान कर रहा।
प्रिये तुम्हारा ध्यान कर रहा।
-नीहार
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खिली धूप -
ठंडी हवा...
दर्द फुगाँ -
आँख धुआं...
शब्द मंद -
मधुर गंध...
सुलग रहा -
केसर मकरंद...
बिखर गयी -
धूप पसर...
स्वर्ण मृग सी -
गयी उतर...
पादप सब -
झूम झूम....
धरती को -
रहे चूम...
फैल गया -
पुष्प गंध...
हवा गाती -
मधुर छंद...
उड़ चला -
लिए रागरंग...
मन हुआ -
जैसे पतंग...
ढल गया -
फिर बसंत...
फागुन मन -
दौड़ के...
बन जाता -
फिर तुरंग.....
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सर्द है मौसम -
चाँद ज़र्द है...
तारों की राह में -
कोहरे की गर्द है...
सिहरती है हवा सीटियों सी -
खामोश रात में...
शबनम को टूट कर -
बिखर जाने का दर्द है....
आंसू पलक पे -
मोतियों सा बर्फ हुआ है....
याद पिघल के लब पे मेरे -
एक हर्फ़ हुआ है...
जैसे की आँख ने फिर -
पहन लिया धुआं...
उजाले पे ज्यूँ छाया -
अँधेरे का गर्द है....
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