सोमवार, 23 अप्रैल 2012

उत्थान और पतन के बीच का द्वंद

उत्थान और पतन के बीच -
मनुष्य खो देता है अपने व्यक्तित्व को......
ऊंचाइयों का शौक  उसे, 
गिरने को कर देता है मजबूर -
वह हो जाता है अपनों से दूर  ,
और -
खुद से भी इतना दूर  कि, 
 आईना भी उसे पहचानने से -
 कर देता है इंकार,
एक काम का आदमी -
स्वयं को कर देता है बेकार....
इसलिए -
हे मनुष्य !
उत्थान और  पतन के द्वंद् से मुक्त हो ,
लीन रहो अपनी कर्म साधना में....
विजय और पराजय की चिंता के  बिना ,
कर्म पथ  पर निर्बाध चलते रहो....
कहीं ना कहीं -
कभी ना कभी तुम्हें,
मिल जाएगा वह चेहरा -
जिसकी खोप्ज में तुम,
रहे भटकते वर्षों से -
और जिसे पहन जब तुम,
आईने के पास जाओगे -
तो सच कहता हूँ ,
यसै वक़्त तुम -
खुद ही खुद को पाओगे। 

- नीहार