रविवार, 22 अगस्त 2010

कुछ उदगार

रिश्तों का संभवतया कोई रंग नहीं होता और रिश्ते न ही रूपवान होते हैं। रिश्ते तो बस रिश्ते हैं - चाहे जैसे भी हों। उनमे रूप और रंग ढूँढने की काबिलिअत हम में कहाँ है ? और अगर है भी तो हम उसे ढूंढ कर करेंगे भी क्या?
मुझे तो लगता है की व्यक्ति और व्यक्ति - परक सोचों से हर व्यक्ति को - या व्यक्ति विशेष को मतभेद होना स्वाभाविक है। तो क्या मतभेदों की वजह से या उनके कारण रिश्तों का अस्तित्व खत्म हो जाए। कभी नहीं - रिश्ते जितने मुलायम होते हैं - रिश्तों की नींव उस से भी ज्यादा मजबूत होनी चाहिए।
- पर पता नहीं क्यूँ - सारे प्रश्न अधूरे होते हैं - उत्तर भी होते हैं - पर अधूरे ही। - रिश्ते भी अधूरे ही रह जाते हैं शायद - पूर्णता की हद किसने जानी है?
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प्रश्न और उत्तर ? समस्या और समाधान ? - बहुत बडी उलझनें हैं। अस्तित्वहीनता के बोझ से दब जाता हूँ - डर जाता हूँ और फिर उस डर से उबरने की कोशिश में लड़खड़ा भी जाता हूँ। कुछ नहीं सूझता - मन भटकता रहता है , जंगल आकाश वन .... भागता रहता है मीलों नंगे पाँव ,रेत - पानी - कंकडों के ऊपर - नंगे पाँव - लहूलुहान पाँव से भागता मन थक सा जाता है - दूर कहीं शायद कोई बोलता है - अभी तो शुरुआत है - और मन की आँखें भर आती हैं - मन रोता है... शांति खोता है.... सो जाना चाहता है थक कर - आराम से - वो नींद जहाँ जगने की नौबत ही न आये...
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कभी कभी मन अजीब से दहशतों की कैद हो जाता है। अगर मैं जो तेरा कुछ भी नहीं- तो ......!!!!पूरा अस्तित्व हवा हो जाता है - जिस्म में किरचें खराश सी उग आती हैं...जीस्त को ये एहसास छेद डालते हैं। ..... कितना बेबुनियादी है ये एहसास - पर बेबुनियादी क्यूँ?.....जिंदगी के फैसले आप से आप नहीं होते - उनकी धाराओं को समयानुसार मोड़ने की ताकत हमारे बाजुओं में होनी चाहिए - पर 'गर बाजू ही न हों? या हों भी तो मजबूत न हों...या मजबूत हों तो टूट गए हों....तो ये सारे डर एक साथ मिलकर मेरी मानसिकता पर सर्प का दंश करते हैं ...... कहाँ हो त्रिलोचन? क्यूँ नहीं पी लेते सारा विष मेरे मानस का और कर देते मुझे विषमुक्त? आ जाओ त्रिलोचन और इस नागदंश से मुझे मुक्त तो करो।
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कभी कभी मुझे ऐसा लगता है की मैं एक ऐसे अंधे मोड़ पर खड़ा हूँ , जहाँ सिवाय मौत के और कोई रास्ता नहीं खुद के बचाव का.....अकेलापन ....ठंडी चेतना को जड़ बनता है,मन को ताप दे तन को साध जाता है - यही अकेलापन है जो मुझे सर से पाँव तक या पाँव से सर तक , निःशब्द काटता है....धीरे धीरे ....जैसे सूखी लकड़ी को टुकड़ों में बांटती आरा मशीन।
यह अकेलापन का जो अभिशाप है- वह मेरे लिए ही है...सर्वथा मेरे लिए ....जंगल में रहूँ या भीड़ में ...अकेला ही रहना होता है। नियति ही यही है....इसे झेलना ही है....किसी न किसी तरह।
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शून्य का विकल्प क्या हो?ओर शून्य का प्रयोजन क्या है? क्या है आखिर इस शून्य का चरित्र?और क्या है इसका प्रारब्ध?.....सच पूछो तो इन अनुत्तरित प्रश्नों के दायरे के भीतर रह कर भी मैं - दायरे से बाहर हूँ - इसलिए नहीं की इस शून्यता को मैं नहीं झेलता, वरन इसकी तो मुझे आदत सी हो गयी है।
सोचता हूँ की जिस दिन धरती काँप उठेगी उसी क्षण हम सबको अपना सर लेकर भागना होगा, उस आकाश के नीचे, जो गिर चुका हो।
मैं तो हर उस जगह अपने आप को पाता हूँ जहाँ शून्यता का एहसास गाता है राग गान्धार और भीड़ की भीड़ मांदर की थाप पर राग भैरव की अहीरी तान सुनती है - ( नाराज तो नहीं हो कृष्ण?)...मन कैसे शांत हो ... मन की पीड़ा क्या वृथा है? ओर अगर है, तो फिर उसकी शान्ति का उपाय क्या है?
मृत्यु!!!!! शायद यही उत्तर हो....शायद.....
- नीहार

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