मेरे बारे में

मेरा फोटो
मैं अभी भी अपने व्यक्तित्व की तलाश में भटक रहा हूँ...बचपन से एक निर्बाध झरने सा जंगल पहाड़ों को चीड़ते हुये बहते रहना मुझे हरदम अच्छा लगता था...तितलियों को उड़ते हुये देखता तो मन ललच जाता था उनके पंख चुराने को...कान्हा का मोरपंख मेरे मानस मे सबसे ज्यादा उपयुक्त वस्तु था खुद के शृंगार का...और बंसी की धुन पर राधा का नृत्य मन को उल्लासित करने का सबसे आसान उपाय...आज भी मेरे लिए ये सारे मौजूद हैं...ये हैं मेरी कल्पना में तो मैं हूँ...

सोमवार, 31 मई 2010

गनीमत है की दिन के बाद रात होती है

गनीमत है की दिन के बाद रात होती है,

उनसे कुछ पल ही सही मेरी बात होती है।

ख्वाब में ही दिखते हैं आजकल वो अक्सर ,

उनसे यूँ ही हर दिन मेरी मुलाकात होती है।

भींगी जुल्फों को जब भी जोर से झटकती हैं

मेरे घर बिन बादल ही फिर बरसात होती है।

उनसे मिलता हूँ तो बातें चेहरे पे आ जाती हैं,

वो भी मुझसे मिल कर खुली किताब होती है।

मेरे हाथों में जब भी वो चाँद बन उतर आता है,

ज़िन्दगी मेरी तब सबसे ज्यादा नायाब होती है।

4 टिप्पणियाँ:

  1. विजय जी अक्सर एेसी कविता लिखते हैं

    यही तो उनकी करामात होती है।

    क्यों साहब। है कि नहीं।


    http://udbhavna.blogspot.com/
    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  2. गनीमत है की दिन के बाद रात होती है,
    उनसे कुछ पल ही सही मेरी बात होती है।

    अच्छी लगा पढ़कर। सुन्दर।


    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com
    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं