शुक्रवार, 21 मार्च 2014

तेरा चेहरा किताब़ है जाना....

तेरा चेहरा किताब़ है जाना,
हर सवाल का जवाब है जाना।
होंठ हिलते हैं तो यूँ लगता है,
जैसे खिलता गुलाब है जाना ।
सीप सी तेरी आँखों से जैसे ,
हर सू छलके शराब है जाना ।
बिखरी हुई है जुल्फ़ इस तरह,
जैसे चेहरे पे नकाब़ है जाना ।
जिससे भी पूछो वो ये कहता है,
तू तो बस लाजवाब है जाना ।
हजार चाँद के जल जाने पर ,
बना तू एक आफताब है जाना ।
पाँव न हो जायें मैले कहीं तेरे,
हाथों को किया रकाब़ है जाना ।
उसके सज़दे झुका है सर मेरा,
जिस पे आया  शबाब है जाना ।
पंख उनका कतर तुम न पाओगे,
हौसला जिनका उकाब है जाना।
नीहार को छिपा के रक्खो सबसे ,
लोग कहते हैं वो नायाब है जाना ।
- नीहार ( चंडीगढ़, १० मार्च, २०१४)