मंगलवार, 12 नवंबर 2013

घोरि घोरि मिश्री पिबैत रहू ........

चूल्हा चौकी करैत रहू,
भरि दिन अहिना मरैत रहू ।
चेहरा चाँद सनक तँ की,
घोघ तानि कय घुटैत रहू ।
वर अहाँक राक्षस तँ कि,
देवता बूझि हुनक पूजैत रहू ।
बेटा जावत नहीं पैदा भेल,
प्रतिवर्ष बच्चा जनैत रहू ।
दोसर के सुख कय खातिर,
अपन सुख अहाँ त्यजैत रहू ।
लक्ष्मी सरस्वती दुर्गा अहीं छी,
तैयो रावण सँ अहाँ डरैत रहू ।
पढ़लहँु लिखलहुँ तैयो सुनु यै,
दहेजक बलि पर रोज चढ़ैत रहु।
मैथिल वयना अछि सबसँ मीठ,
घोरि घोरि मिश्री अहाँ पिबैत रहू ।

- नीहार