रविवार, 18 जुलाई 2010

मन बैरी सावन भया

मन बैरी सावन भया , तन हुआ दोपहरी धूप,
सांस भाई लोबान सरीखी, जीवन भया अनूप।
मन गूंजे संगीत सदा , तन भया नाचता मोर,
धड़कन में है प्रिया बसी, जो करती रहती शोर।
पलक उठे तो सुबह सोना बन कर खिल जाती,
पलक झुके तो आ जाती है बिरहनी रात कठोर।
उन बिन जीवन मरू हुआ,ज्यूँ गरम रेत की ढेर,
तन बियाबान जंगल बना,मन भया आदमखोर।
मन लिपटा उनसे इस तरह ,जैसे चन्दन से हो सर्प ,
हर घडी सोचे उनको ही ,उन बिन कहीं नहीं है ठौर।
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अधर धरत हैं अधर पे,और अमृत रस हैं पीत,
भ्रमर सलोना श्याम करे ,राधा पुष्प से प्रीत।
मन जब से मंदिर हुआ, मंत्र हुआ सब भाव,
जो राधा राधा रट लिया,भर जाए मन के घाव।
मन तडपे राधा दरस को,तन होय दहकती आग,
श्याम रचाते रास जब, मन खेले रंग संग फाग।
तन जैसे ब्रिन्दावन हुआ, मन जैसे ब्रज की धूल,
सोच हुआ यमुना तट पे, खिला कदम्ब का फूल।
मन के अन्दर बज रहा, ज्यूँ घड़ी घंट घड़ियाल,
इन्द्रियां हुयी राधा समान , देती बंशी धुन पर ताल।
सांस हुयी है बावरी, कभी इत और कभी उत जाए,
श्याम बंशी की धुन पर ज्यूँ प्यारी राधा बहकी जाए।
-नीहार