बुधवार, 28 जुलाई 2010

स्वप्न फूल सा झर झर जाते,झरनों सा वो कल कल गाते

जब आंसू कतरा दर कतरा टपकेगा,
तब कोई करवट दर करवट बदलेगा।
आंसू के कतरे दिखे न दिखे उनको पर ,
उनका दिल दर्द की हद से गुजरेगा।
जब कोयल को पिया की याद सताएगी,
तब वह छुप छुप विरह के गीत गाएगी।
जब चाँद बादल संग आँख मिचौली खेलेगा ,
उस पल प्यासा मन सावन को तरसेगा ।
दरवाज़े पे हवा सुरीली सीटी जब बजाएगी,
उनके आने की आहट मेरे दर पे आएगी।
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एक रौशनी का कतरा मेरे भीतर तक उतर गया,
जब से उस माहताब ने मेरे दिल में घर किया।
मेरी प्यास बुझती ही नहीं थी किसी भी पानी से,
बुझ गयी है प्यास जो उनकी आँखों से मैंने पिया।
सुना है आज कल खुदा भी नाराज़ रहता है मुझसे ,
मैंने सुबह सुबह जो उठ के उनका नाम ले लिया।
चन्दन चन्दन भीनी भीनी खुशबु खुशबु बन उस ने,
मेरे जीवन को सात रंग और सात सुरों से सजा दिया।
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पत्तियों की सरसराहट जब भी मुझे सुनायी देती है,
ऐसा लगता है हवाएं तेरा नाम फुसफुसा के लेती है।
जब भी आस पास सुनता हूँ तेरी आवाज़ की खनक,
मुझे दूर कहीं मंदिर में बजती मधुर घंटी सुनाई देती है।
रात भर सेहरा पे तुम ऊँगली से लिखते रहे नाम मेरा,
वक़्त की ज़ालिम थपेरें उसे सुबह को मिटाए देती है ।
जब भी मैं महसूसता हूँ बड़ी शिद्दत से खुद में तुमको,
मुझे मौत के साए में भी जैसे एक जिंदगी दिखाई देती है।
बस करीब आके मुझे छू लो तुम ई मेरी जान - ए - अदा ,
तेरे दिल में मेरी धड़कन बस चाहत बन के पनाह लेती है।
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स्वप्न फूल सा झर झर जाते, झरनों सा वो कल कल गाते,
छल छल आँखें बहती अविरल , पल पल पी की याद दिलाते।
खन खन मन संगीत खनकाता,झम झम सावन सा बरसाता,
गुन गुन भँवरे गुन्जन करते, फूलों का सब मकरन्द चुराते ।
स्वप्न फूल से झर झर जाते, झरनों सा वो कल कल गाते।।
खिल खिल जाता चाँद सा चेहरा, छंट सा जाता गम का कोहरा,
मन मयूर सा नच नच जाए, पिया का दर्शन जब वो हैं पाते।
स्वप्न फूल सा झर झर जाते, झरनों सा वो कल कल गाते।
-नीहार

रविवार, 18 जुलाई 2010

मन बैरी सावन भया

मन बैरी सावन भया , तन हुआ दोपहरी धूप,
सांस भाई लोबान सरीखी, जीवन भया अनूप।
मन गूंजे संगीत सदा , तन भया नाचता मोर,
धड़कन में है प्रिया बसी, जो करती रहती शोर।
पलक उठे तो सुबह सोना बन कर खिल जाती,
पलक झुके तो आ जाती है बिरहनी रात कठोर।
उन बिन जीवन मरू हुआ,ज्यूँ गरम रेत की ढेर,
तन बियाबान जंगल बना,मन भया आदमखोर।
मन लिपटा उनसे इस तरह ,जैसे चन्दन से हो सर्प ,
हर घडी सोचे उनको ही ,उन बिन कहीं नहीं है ठौर।
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अधर धरत हैं अधर पे,और अमृत रस हैं पीत,
भ्रमर सलोना श्याम करे ,राधा पुष्प से प्रीत।
मन जब से मंदिर हुआ, मंत्र हुआ सब भाव,
जो राधा राधा रट लिया,भर जाए मन के घाव।
मन तडपे राधा दरस को,तन होय दहकती आग,
श्याम रचाते रास जब, मन खेले रंग संग फाग।
तन जैसे ब्रिन्दावन हुआ, मन जैसे ब्रज की धूल,
सोच हुआ यमुना तट पे, खिला कदम्ब का फूल।
मन के अन्दर बज रहा, ज्यूँ घड़ी घंट घड़ियाल,
इन्द्रियां हुयी राधा समान , देती बंशी धुन पर ताल।
सांस हुयी है बावरी, कभी इत और कभी उत जाए,
श्याम बंशी की धुन पर ज्यूँ प्यारी राधा बहकी जाए।
-नीहार

बुधवार, 14 जुलाई 2010

कुछ बात करो मुझसे तुम.....एवं कुछ अन्य रचनाएं


कुछ बात करो मुझसे तुम,मेरा मन रूखा रूखा है,

प्रेम पयोधि पीकर भी, देखो लगता भूखा भूखा है।

झर झर झर निर्झर बहता,कानो में मेरे है कहता ,

तुम बिन मरू का सा है जीवन,सब सूखा सूखा है।

प्रेम पयोधि पीकर भी , देखो लगता भूखा भूखा है।

फूल फूल पत्ते पत्ते ,कानो में कहते फ़ुसक फ़ुसक,

मन के अन्दर ज्वाल सरीखा , जैसे फूका फूका है।

प्रेम पयोधि पीकर भी, देखो लगता भूखा भूखा है।

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तन्हाई को पीकर मैं खिलता रहता हूँ एक धूप सरीखा ,

मेरे भीतर का तम किसको दिखता है यह वो ही जाने।

पीर परायी मेरे आँख से बहती गंगा जमुना की धारा बन,

मेरे भीतर एक आग का दरिया बहता रहता है वो ही जाने।

चन्दन चन्दन खुशबु बन कर,बादल बादल उड़ता हूँ मैं,

तपती धरती का दर्द समेटे, मैं क्यूँ उड़ता हूँ यह वो ही जाने।

उसको पाकर उसमे रंग कर मैं पारिजात सा खिल जाता हूँ,

मैं खुद को उसमे क्यूँ खो देता हूँ ,यह मै ना जानू वो ही जाने।

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मैं सन्नाटा बुनता हूँ...

जो भी उल्टा सीधा मन में आता,उसको हर घडी मैं धुनता हूँ।

मैं सन्नाटा बुनता हूँ...

जब भी तुमसे मैं मिलता हूँ , अधरों पे बंशी सा मैं बजता हूँ ,

तेरी गोदी में सर रख कर मैं, सागर की बस ठाठें ही सुनता हूँ।

मैं सन्नाटा बुनता हूँ...

मुझको जब भी तेरे ख्वाब बुलाते हैं , आकर मेरी तन्हाई में,

मैं चुप चुप से तेरी आँखों में , बस डूबता हूँ और उतराता हूँ।

मैं सन्नाटा बुनता हूँ...

मैं कहता रहता हूँ तुमसे ही अपने दिल की सारी बातें अक्सर ,

तुम जो कुछ भी कह नहीं पाते, मैं उनको भी अक्सर सुनता हूँ।

मैं सन्नाटा बुनता हूँ...

--नीहार